भारतीय रेल में सामान्य डब्बे की दुर्दशा

 

भारतीय रेल

भारतीय रेल का इतिहास 168 साल पुराना है। इसकी शुरूआत भारत में अंग्रेजों के शासन काल से हुई। भारतीय रेलवे ने सबसे पहली ट्रेन 18वीं सदी में चलाई गई। देश में पहली रेल 16 अप्रैल 1853 को बंबई के बोरी बंदर स्टेशन जो कि अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनल) से ठाणे के बीच चलाई गई थी।



भारतीय रेल नेटवर्क का एशिया में कौन सा स्थान है?

सन् 1880 तक भारतीयरेलवेप्रणाली में लगभग 9000 मील लंबा रेलमार्ग उपलब्ध हो चुका था। भारतीयरेलवे, देश का प्रमुख यातायात संगठन जो एशिया का सबसे बड़ा और एक प्रणाली प्रबंधन के अधीन विश्व का दूसरा सबसे बड़ा रेलवेनेटवर्कहै। https://indianrailways.gov.in/

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रेलगाड़िया का प्रकार

·        गतिमान एक्सप्रेस – दिल्ली से आगरा के बीच 160 किमी प्रति घंटे तक की रफ्तार से चलने वाली रेल है। ये रेल हजरत निजामुद्दीन से आगरा की 188 किमी दूरी मात्र 100 मिनट में तय कर लेती है|

·        राजधानी एक्सप्रेस – ये रेलगाड़ी भारत के मुख्य शहरों को सीधे राजधानी दिल्ली से जोडती हुयी एक वातानुकूलित रेल है इसलिए इसे राजधानी एक्सप्रेस कहते है| ये भारत की सबसे तेज रेलगाड़ियो में शामिल है जो लगभग 130-140 किमी प्रति घंटे की रफ्तार तक चल सकती है| इसकी शुरुआत 1969 में हुयी थी|

·        शताब्दी एक्सप्रेस – शताब्दी रेल वातानुकूलित इंटरसिटी रेल है जो केवल दिन में चलती है| भोपाल शताब्दी एक्सप्रेस भारत की सबसे तेज रेलों में से एक है जो दिल्ली से भोपाल के बीच चलती है| ये रेलगाड़ी 150 किमी प्रति घंटे की रफ्तार तक पहुच सकती है| इसकी शुरुवात 1988 में हुयी थी|

·        दुरन्त एक्सप्रेस – 2009 में में शुरू हुयी यह रेल सेवा एक नॉन स्टॉप रेल है जो भारत के मेट्रो शहरों और राज्यों की राजधानियों को आपस में जोडती है| इस रेल की रफ्तार लगभग राजधानी एक्सप्रेस के बराबर है|

·        तेजस एक्सप्रेस – ये भी शताब्दी एक्सप्रेस की तरह पूर्ण वातानुकूलित रेलगाड़ी है लेकिन शताब्दी एक्सप्रेस से हटकर इसमें स्लीपर कोच भी है जो लम्बी दूरी के लिए काम आती है|

·        उदय एक्सप्रेस – दो मंजिला , पूर्ण वातानुकूलित ,उच्च प्राथमिकता , सिमीत स्टॉप , रात्रि यात्रा के लिए अच्छी है|

·        जनशताब्दी एक्सप्रेस – शताब्दी एक्सप्रेस की सस्ती किस्म , गति 130 किमी प्रति घंटा , AC और Non-AC दोनों है|

·        गरीब रथ एक्सप्रेस – वातानुकूलित, गति अधिकतम 130 किमी प्रति घंटा, साधारण कोच से लेकर 3 टियर इकॉनमी बर्थ है|

·        हमसफर एक्सप्रेस – पूर्ण वातानुकूलित 3 टियर AC कोच रेलगाड़ी

·        संपर्क क्रांति एक्स्प्रेस – राजधानी दिल्ली से जोडती सुपर एक्सप्रेस रेलगाड़ी|

·        युवा एक्सप्रेस – 60 प्रतिशत से ज्यादा सीट 18-45 साल के यात्रियों के लिए रिज़र्व है|

·        कवि गुरु एक्सप्रेस – रविन्द्रनाथ टैगोर के सम्मान में शुरू रेलगाड़ी है|

·        विवेक एक्सप्रेस – स्वामी विवेकानंद की 150वी वर्षगांठ पर 2013 में शुरू है|

·        राज्य रानी एक्सप्रेस – राज्यों की राजधानियों को महत्वपूर्ण शहरों से जोड़ती रेलगाड़ी है|

·        महामना एक्सप्रेस – आधुनिक सुविधाओं युक्त रेलगाड़ी है|

·        इंटरसिटी एक्सप्रेस – महत्वपूर्ण शहरों को आपस में जोड़ने के लिए छोटे रूट वाली गाडिया है|

·        एसी एक्सप्रेस – ये पूर्ण वातानुकूलित रेलगाड़ी भारत के मुख्य शहरों को आपस में जोडती है | ये भी भारत की सबसे तेज रेलगाड़ियो से शामिल है जिसकी रफ्तार लगभग 130 किमी प्रति घंटा है|

·        डबल डेकर एक्सप्रेस – ये भी शताब्दी एक्सप्रेस की तरह पूर्ण वातानुकूलित दो मंजिला एक्सप्रेस रेल है| ये केवल दिन के समय सफर करती है और भारत की सबसे तेज रेलों में शामिल है|

·        सुपरफ़ास्ट एक्सप्रेस – लगभग 100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली गाडिया है|

·        अन्त्योदय एक्सप्रेस और जन साधारण एक्सप्रेस – पूर्ण रूप से अनारक्षित रेल है|

·        पैसेंजर – हर स्टेशन पर रुकने वाली धीमी रेलगाड़ियां (40-80 किमी प्रति घंटा), जो सबसे सस्ती रेलगाड़ियां होती है|

·        सबअर्बन रेल – शहरी इलाको जैसे मुम्बई ,दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, हैदाराबाद, अहमदाबाद, पुणे आदि में चलने वाली रेलगाड़ियां, जो हर स्टेशन पर रुकती है और जिसमे अनारक्षित सीट होती है|

सन्दर्भ : https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B2

 

 

भारतीय रेलवे में विभिन्न प्रकार के कोच होते हैं.

 

फर्स्ट एसी (1A)

फर्स्ट एसी क्लास भारतीय रेलवे की सबसे महंगी श्रेणी है. ये कोच पूरी तरह वातानुकूलित होते हैं. इसके प्रत्येक कम्पार्टमेंट में 2 या 4 बर्थ होती हैं. 2 बर्थ वाले कम्पार्टमेंट को कूप (coupe) और 4 बर्थ वाले कम्पार्टमेंट केबिन (cabin) कहते हैं. प्रत्येक कम्पार्टमेंट में एक दरवाजा होता है, जिसे यात्री अंदर से बंद कर सकते हैं. फर्स्ट एसी में साइट अपर या साइड लोवर बर्थ नहीं होती हैं. प्रत्येक यात्री के लिए एक डस्टबिन और एक छोटी टेबल होती है. राजधानी जैसी रेलगाड़ियों में यात्रियों को विशेष प्लेट और कटोरियों में खाना दिया जाता है और खाने का मीनू 2nd AC और 3rd AC क्लास से अलग होता है. ट्रेन में अटेंडेंट को बुलाने के लिए प्रत्येक कम्पार्टमेंट में एक खास बटन होता है. सीट बेहद सुविधाजनक होती है.

 



 

सेकेंड एसी (Second AC)

भारतीय रेलवे का 2nd AC कोच 1st AC से सस्ता है और 3rd AC से महंगा. इसमें सुविधाएं भी थर्ड एसी के मुकाबले अधिक हैं और फर्स्ट एसी के मुकाबले कम. इसमें कोई मिडिल बर्थ नहीं होती है. हालांकि साइड अपर और लोवर सीट होती हैं. इस तरह प्रत्येक कम्पार्टमेंट में 6 सीटें होती हैं. ये कोच एसी थर्ड क्लास के मुकाबले कम भीड़-भाड़ वाले होते हैं. प्रत्येक कम्पार्टमेंट में पर्दे लगे होते हैं और सीट बेहद सुविधाजनक होती हैं. यात्रियों को तकिया, चादर और कंबल दिया जाता है. यहां खाना थर्ड एसी जैसा ही होता है, लेकिन अगर आप एक्स्ट्रा रोटी या दाल लेना चाहें तो ले सकते हैं. प्रत्येक बर्थ में एक रीडिंग लैंप होता है.

 

थर्ड एसी (Third AC)

थर्ड एसी कोच मीडिल क्लास भारतीयों की पहली पसंद है. बेहद सरल भाषा में कहा जाए तो ये कोच बिल्कुल स्लीपर क्लास की तरह होते हैं, बस स्लीपर क्लास वातानुकूलित नहीं होता है और ये कोच वातानुकूलित होते हैं. प्रत्येक कम्पार्टमेंट में 8 सीटें होती हैं. लोवर बर्थ के बैकरेस्ट को ऊपर उठाकर मिडिल सीट बनाई जाती है. थर्ड एसी में सफर के दौरान तकिया, कंबल और चादर दिया जाता है. खाना सेकेंड एसी और थर्ड एसी में एक जैसा होता है. इसमें पर्दे नहीं होते हैं.

 

इनके अलावा भारतीय रेलवे फर्स्ट क्लास, एसी एक्जीक्यूटिव क्लास, थर्ड एसी इकनॉमी क्लास, एसी चेयर कार और सेकेंड सीटिंग कोच का संचालन भी करती है. हर प्रकार की रेल में कोच के प्रकार में बदलाव होता रहा है.

 

जनरल बोगी

इसके अलावा हर रेल में जनरल बोगी लानाना अनिवार्य होता है. ये जनरल बोगी होती जो अनारक्षित होती है और कोई भी इसमें बैठ सकता है.

 


वर्ग

रेलवे की सारी समस्या इसी सामान्य बोगी के साथ शुरू होती है और भारतीय रेल भारत को दो हिस्सों में विभक्त करती है – विशेष और आम व्यक्ति. या उच्च वर्ग और सामान्य वर्ग.

 

समस्या

हर प्रकार की रेल में सामान्य बोगी लगना अनिवार्य है. हर ट्रेन में जनरल बोगी लगती है किन्तु यही से समस्या शुरू होती है. भारत की जनसँख्या के अनुसार २०-२५ बोगी की ट्रेन में केवल 2-४ जनरल कोच. दो आगे और दो पीछे. किसी किसी रेल में 6 बोगी भी लगती है.

 

जिस देश में 70 प्रतिशत जनसँख्या सामान्य हो वहां केवल 2-4 जनरल बोगी से क्या काम चल सकता है. जी नहीं. ऊंट में मुहँ में जीरा.

 

जनरल बोगी में दुखदायक सफ़र

एक तरफ तो हर तरह के आरक्षित कोच में 70-80 ही व्यक्ति सफ़र करते हैं. अलग से एक व्यक्ति भी नहीं घुस सकता. किन्तु जनरल बोगी में 100 – 200 या 300 लोग भी इल्लियों की तरह सफ़र करते हैं.

 

कई बार आधी जनरल बोगी तो रेलवे के पर्सेल के लिए बंद रहती है. एक बोगी अक्सर आर्मी के जवानों के लिए अनाधिकृत रूप से रिज़र्व होती है जिसमे कोई व्यक्ति घुस ही नहीं सकता है.

 

रिज़र्व कोच में कौन सफ़र करता है.

रिज़र्व कोच में वह सफ़र करता है तो एक, दो महीने से पहले से अपनी यात्रा निश्चित करके रखता है. इसका मतलब की यह सुविधाजनक आरामदायक रेल सेवा है. जिसके सफ़र के तिथि तय नहीं होती है, कम दूरी का सफ़र करना है या आकस्मिक रूप से जाना पड़ता है वह मज़बूरी से जनरल बोगी में सफ़र करता है. क्योंकि ज्यादा से ज्यादा पैसा देकर भी रिज़र्व कोच में जगह नहीं मिल पति है और जाना जरुरी होता है तो जनरल बोगी में जैसे तैसे घुस कर ही सफ़र करना पड़ता है.

 

यहीं से भारतीय रेल में भ्रष्टाचार की शुरुआत होती है. लोग सफ़र करने के लिए कितने भी पैसे देने को तैयार होते हैं. अकेले तो व्यक्ति कैसे भी सफ़र कर लेता हैं किन्तु परिवार के सदस्य खासकर बुजुर्ग, महिला, बच्चे हों तो सक्षम व्यक्ति कितना भी पैसा देने को तैयार होता है. जो सक्षम नहीं होता है किन्तु जैसे तैसे करके पैसा खर्च करता है.

 

मानवीय मूल्य का ह्रास

यहाँ मानवीय मूल्यों का पतन देखने को मिलता है. जो पहले सीट पर कब्ज़ा कर लेता है, फिर सो कर भी सफ़र कर सकता है अगर लड़ने के ताकत है किन्तु बुजुर्ग, महिला, बच्चे खड़े खड़े सफ़र करते है.

 

नियम :

यहाँ भारतीय संविधान नियमों के मामले में आँख बंद कर लेता है. यहाँ कोई नियम कानून नहीं चलते हैं. जिसके पास ताकत है वही बैठ कर – सो कर सफ़र कर सकता है. यहाँ न तो रेलवे पुलिस कुछ कर सकती है और न ही कोई और कानून काम करता है.

 

भारतीय मोटर नियम :

भारतीय मोटर यान के अनुसार दुपहिया में दो से ज्यादा नई बैठ सकते है. चार पहिये वाहन में पांच, सात, नौ और बस में 24, 36, 48 आदी नियम के अनुसार ही सफ़र कर सकते हैं. भारतीय रेल के रिज़र्व कोच में भी 76-80 ही सफ़र कर सकते हैं किन्तु जनरल में कितने भी सफ़र कर सकते हैं. जितने घुस सकते हैं.

 

ऐसा देश की हर राज्य, हर जिले में देखने को मिलता है. हर ट्रेन में में यही नजारा होता है.

 

कोरोना के समय हालात :

कोरोना के सबसे ज्यादा असर आम व्यक्ति पर पड़ा है. जनरल बोगी बंद होने से आम व्यक्ति पर दुहरी मार पड़ी है. एक तो रोजगार धंधे बंद ऊपर से महंगे सफ़र ने उनकी कमर तोड़ दी है.

 

जिसको जगह मिलती है उनके लिए अधिकार है

व्यक्ति के नियम परिस्थिथि के अनुसार बदल जाते हैं. जिसको रिजर्वेशन बोगी में जगह मिल जाती है वह इसे अपना मोलिक अधिकार कह देता है. किन्तु जिसे रिज़र्व बोगी में जगह नहीं मिलती है और जनरल बोगी में खड़े होकर सफ़र करता है तो मानवाधिकार की बात करता है.

 

सामान्य जनता अर्थव्यवस्था की धुरी है

देश की मुद्रा को नियंत्रित करती है. जितने बड़े बड़े लेन देन होते हैं वे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से होते हैं और वह पैसा सीधा बैंक में जाता है. आम व्यक्ति में या बाजार में कम चलता है. किन्तु आम व्यक्ति जब सस्ता सफ़र करेगा, रोजगार के लिए थोडा दूर जायेगा, पैसा लाकर बाजार में खर्च करेगा. वह पैसा बैंक में ना जाकर बाजार में घूमेगा. घूमता हुआ पैसा ही अर्थव्यवस्था को ताकत देता है.

 

मानवाधिकार आयोग :

मैंने इस सन्दर्भ में 15 साल पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखा था था जहाँ से जवाव आया की वह भारतीय रेलवे पर कार्यवाही करने में सक्षम नहीं है, यह उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है.

 



पचास प्रतिशत जनरल बोगी हो

भारतीय रेल में कम से कम पचास प्रतिशत जनरल बोगी होनी चाहिए. लोग बस में सवा या डेड फुट की जगह में दस से बीस घंटे का सफ़र कर लेता है किन्तु जब रेल की बात आती है तो उसे छ: फुट की पूरी जगह अकेले ही चाहिए.



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